क्या छोड़ा और क्यूँ छोड़ा
फ़िज़ूल की ज़रूरते पूरी करते करते
खुद को खुद की जरूरत भी कब फ़िज़ूल लगने लगी
उस धोबी के कुत्ते की तरह ज़लील लगने लगी
पता ही नहीं चला
पता ही नहीं चला कि
कब किराए के घर में सीलन पड़ने लगी
आँगन में धँसे हैण्ड पम्प की साँसे उखड़ने लगी
पता ही नहीं चला कि
कब बांसुरी के पोरों में हल्की दरारें आने लगी
खूंटे पे टंगे दूनाली से आवाज़ें आने लगी
कब हमने जीना छोड़ा
बातों बातों में हँसना छोड़ा
क्यूँ किया हमनें वो किला फ़तेह
जिसे लोगों ने चर्चों में लाना छोड़ा
क्यूँ बनाया हमने वो ताजमहल
जिसमे मुमताज की याद़ों ने बसना छोड़ा
फ़िज़ूल की जरूरतें पूरी करते करते
फ़िज़ूल की ज़रूरते पूरी करते करते
खुद को खुद की जरूरत भी कब फ़िज़ूल लगने लगी
उस धोबी के कुत्ते की तरह ज़लील लगने लगी
पता ही नहीं चला
पता ही नहीं चला कि
कब किराए के घर में सीलन पड़ने लगी
आँगन में धँसे हैण्ड पम्प की साँसे उखड़ने लगी
पता ही नहीं चला कि
कब बांसुरी के पोरों में हल्की दरारें आने लगी
खूंटे पे टंगे दूनाली से आवाज़ें आने लगी
कब हमने जीना छोड़ा
बातों बातों में हँसना छोड़ा
क्यूँ किया हमनें वो किला फ़तेह
जिसे लोगों ने चर्चों में लाना छोड़ा
क्यूँ बनाया हमने वो ताजमहल
जिसमे मुमताज की याद़ों ने बसना छोड़ा
फ़िज़ूल की जरूरतें पूरी करते करते
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