पथिक एक चल रहा है मंजी की तलाश में
सुबह दोपहर शाम ओ शहर
उसे पता है या सुन रखा है की
यहीं कहीं है उसका घर जिसे सब
धरती पर स्वर्ग कहते हैं
धनुषाकार आँगन ,रेतों के उपवन
जल थल अम्बर का होता जहाँ मधुर मिलन
वहीँ रहती है वो दीप शिखा
जलती है वहीँ के मंदिरों में ,गलियों में ,धरो में
अपनी आभा के पंखों को ऐसे पसारती है
जैसे खिड़की से सुबह की रौशनी कमरे में मुस्कुराती है
उडती है मनचलों सी उन झुके टहनियों में ,जड़ों में ,फलों में
बोलती है उन कोपलों में जो अभी फूटे हैं
उन कोयलों की गूंज में जो अभी छूटे हैं
उरेलती हैं मधुसागर हृदय में ऐसे
छूटता हो पानी बांध का
चीरने फाटकों को डुबोने खरी फसलों को जैसे
वहीँ कहीं रहती है वो दीप शिखा जो
बुझती है तो आमवास की रातें भी प्यारी लगती हैं
जलती है तो जेठ की दोपहरी भी रूमानी लगती है