मेरे घर के गली के पास वाले सड़क के किनारे
बिन पत्ते वाला एक ताड़ का पेड़ है
उसी पेड़ के निचे चार गज चादर तले दो बच्चे
मई की गर्मी झेलते, गिरे- पड़े ,छूटे -छाते प्लास्टिक
की थैलियों में पेट की गर्मी का इलाज़ धुन्ध्ते
सिसक रहे हैं
गलती शायद हमारी ही है जो
गुस्से में तमतमाता सूरज मानो पिघला देना चाहता हो
उस दीवार को जो सडको और घरों में रहने वालों के बीच है
बताना चाहता हो की नर्म कालीन और ठन्डे बगीचे
से निकलो और झुलस रहे भविष्य को भी
छाओं में ले चलो अपने अपने नाओं में ले चलो
झूलने दो थोडा इन्हें भी अहसास के पलने में
भरने दो इन्हें छलांग विश्वास के आंगने में
मौसमों के आने जाने में थोडा फर्क तो करने दो
ऊपर बैठे हाकिमों से अपनी किस्मत पर जिरह तो करने दो
वरना क्या फायदा है यहाँ उन्ही आने में और चले जाने में ??
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