Wednesday, June 5, 2013

Logic and creativity does not go hand in hand.If u read palmistry---the shape of the head line says one is creative if it is a curve and practical and logical if its straight.U need 3 points to draw a curve and only two for a straight line. The point is --- to be creative we all need that extra point----- -----
From the chapters of SURENDRANAGAR -------
आज बड़े दिनों बाद लोकल थिएटर में मूवी देखने गया .सुरेंद्रनगर कहने को तो डिस्ट्रिक्ट है पर एक बगीचे जिसके बीच में एक तालाब है ,कुछ ठेलेऔर वहां उसे घेरे मुंह chatpatate लोग ,सड़कों के किनारे दुकानों पे शतरंज खेलते बूढ़े , नर्मदा से जुडती नहरें और इक बड़े से बांध के अलावे कुछ नहीं है .रातें तो यहाँ की ऐसी हैं की क्या बताऊँ ,मैं पिछले ३ महीनों में आज पहली बार रात में बाहर निकला ,पर लगा की उतना भी बुरी नहीं है---- रास्तों की रौशनी वो भी गर्मियों में . हाँ पिछली बार मैं सर्दियों में निकला था ,घुप्प सन्नाटा,कुत्ते भी ठण्ड में किकुर के भूंक नहीं पा रहे थे.पर गर्मी में हवाएं सड़कों पे रात को ओढ़े दौडती है. सनीमा हॉल भी माशाल्लाह लाजवाब थी --- मिलन टाकिज .और हाँ जैसा नाम वैसी जगह , यहाँ आपको सब मिल जायेगा .टाकिज की बनावट देख कर हमें हॉलीवुड वाले ओपेरा थिएटर की याद आ गयी .बारिश तेज़ हो रही थी ,उसी बीच मेरे दोस्त को हॉल की छत को देख के डर सताने लगा की फिल्म का मज़ा लेते लेते कहीं इसकी छत बारिश की भेंट न चढ़ जाये ? बालकनी भर गयी थी, चिक्कन टिक्का इतना मजेदार था की लेट हो गए और आगे बैठना पड़ा , सत्याग्रहियों की तरह भूख हरताल पर .पंखे नहीं थे ,एग्जिट खोल रखे थे ,क्रॉस वेंटिलेशन को बढ़ावा दिया गया था , बिजली की बचत की जा रही थी, जैसे तैसे ३ -४ सीट बदलने के बाद एक कोने में पंखे के निचे जगह मिली हमें . फिल्म शुरू हुई ही थी की कुछ पुराने हिंदी फिल्मों के डायलाग पर कुछ गुजराती मित्र वैसे ही ठहाके लगाने लगे की जैसे कभी लोग कुछ बातों को बार बार सुन तो लेते हैं पर अर्थ नहीं जानने के कारन उनके मतलब किसी और तरीके से अपने आव भाव से व्यक्त कर देते हैं . हमारी हंसी छुट जा रही थी ,पर मज़ा आ रहा था .ठीक बारह बजकर १४ मिनट पर फिल्म ख़त्म हो गयी , बाहर निकल के आइसक्रीम खाया और यह सोचता चला आया की अकेले बिताये हुए ३ महीने की रातों के बदले अगर एक दो रातें ऐसी भी गुजरे तो अकेले रहना छोड़ दूंगा और तय यह हुआ की अगले हफ्ते से हर नयी फिल्म इसी टाकिज में देखि जाएगी और वो भी पूरे सत्याग्रहियों वाली लाइन में .--------------------- GOOD NIGHT

Monday, April 15, 2013


INTROSPECTION SERIES  2.
सुबह से 'Chariots of fire' का  बैकग्राउंड स्कोर सुन रहा हूँ ---अब शाम होने को है फिर भी  सुनता ही जा रहा हूँ .सच मानिये संगीत निः शब्द रहते हुए भी न जाने कितने ही शब्भेदी बाण चलाता रहता है ---- मन के हर कोनो को जगाता रहता है .मुझे पता  है की जो संवेदनाएं मेरे अन्दर अभी जगी हैं कितनी भी कोशिश करूँ कागज़ पर नहीं उकेर सकता शायद इसीलिए संगीत विद्या को अन्य किसी भी विद्या से ऊपर का दर्जा प्राप्त है --अब चाहे इसे समझना ,सीखना कठिन हो या इसे शब्दों का रूप देना .
          संगीत एक संगम है जिसमें बहुत सरे छिटपुट,दबे और नए उपजे भावों को एक जुट कर प्रस्तुत किया जाता है .लेखनी वास्तव में ये करने में बहुत पीछे छुट जाती है .सही कहूँ तो आपको क्या लगता है गुलज़ार साहब के वो इज़ाज़त वाला गाना 'मेरा कुछ सामान --तुम्हारे पास पड़ा है ' कैसा  होता  अगर उन्हें स्वर बद्द्ध न किया जाता .शायद याद भी न रहते ---और अगर रहते भी तो आरे तिरछे और टूटे फूटे दृश्यों  के रूप  में .
          पूरे विश्व में संगीत की एक ही भाषा है .उन्हें समझने के लिए लेखनी की तरह भाषा रुपी बैसाखी की जरूरत नहीं पड़ती .भले ही लोग कितने भी बड़े अनुवादक हों पर एक जर्मन कवि की जर्मन में लिखी कविता की नैसर्गिकता और पवित्रता को हिंदी या किसी अन्य भाषा में पूर्णतया नहीं दिखा सकते .---पर यही संगीत बड़ी आसानी से कर जाती है .जाने कितने ही जुगलबंदियां इसके साक्ष्य हैं .YOU TUBE  खोलिए तो आपको दिख जायेगा की कैसे ERIC CLAYPTON  और ANOUSHKA SHANKAR राग यमन में बातें कर लेते हैं . B B SINGH और JIM VAUGHN अफ्रीकन ब्लूज पर एक साथ थिरक लेते हैं .
        संगीत शरीर में खून की तरह दौड़ता है तभी तो पूरा  विश्व SHAKEERA के साथ 'WAKA -वाका' पे झूमता है इसकी बिना परवाह किये हुए की शब्दों के अर्थ क्या हैं ---- बोल क्या हैं ?---- संगीत इन सब बंधनों से परे हमें उस STATE OF MIND  में पहुंचा देता है जहाँ से लौटने का मन नहीं करता ---

Saturday, April 6, 2013

3.From the collection of my 'STORIES RETOLD'

दो पंखों वाली वो गोल मुंह वाली तितली याद है ?
आंखें बिलकुल माथे पर लगी बिंदी की तरह होती थी 
३६० डिग्री में पूरा सर घूम जाता था उसका 
वैसा ही मेरा मन भी घूमता रहता था उड़ता रहता था 
सर पे पंख लगाये आँखों में टेलिस्कोप लगाये 
मैं बचपन में उस तितली के पीछे रस्सी बाँध कर साथ में दौड़ा करता था 
वो पतंग थी और मैं उसका लटाई होता था 
याद है मुझे उस समय मैं और बस लाल परी ही होती थी
दोपहर शाम बस यही धमाचौकरी होती थी पर
आज शामें ज्यादातर खाली होती है --- दोपहर भर चाकरी होती है
सर के पंख धुप में सुख गए हैं ---- टेलिस्कोप के लेंस भी पुराने घिसे से हो गए हैं
मन आज भी उड़ता है पर कम ऊंचाई पर
डर लगता है इसको की कहीं थोड़ी सी ढील मिलने पर
२५ साल से लपेटे हुए धागे दुबारा न खुलने लगे ----------

-------------------------------अनंत-------------------------------------

2. From the collection of my 'STORIES RETOLD'
बात कुछ दिनों पहले की है
मानसून के  बाढ़ कई देखे पर
वहां देखा बिन मानसून वाला   बाढ़
दूर एक बांध से पानी  छोड़ दिया गया
जैसे लाल कपडे को आगे रख सांड को छोड़ दिया जाता है
कितनों को उलट ता कितनों को चीरता शांत होता है मरने के बाद
उस बांध के सांड ने भी वही किया
घर बार ,गाय  बैल, कपडे लत्ते सब
मिनटों में अधजली लाशों की तरह फूलने लगे
उगते डूबते कुछ शक्लें दिखी जिन्हें उठाने हेलीकाप्टर भी भेजे गए थे
डूबना उन्हें मंज़ूर था पर गृह त्याग और विस्थापित होना नहीं
वहीँ पर तो उन्होंने जीना शुरू किया उनके बच्चों ने भी चढ़ना शुरू किया
उन जंगली पेड़ो की टहनियां जब उस  उम्र में कुछ बच्चे ककहरे की सीढिया चढ़ते हैं
वो जागते हैं रातों में अलाव जला के ऊपर मचानों में
वहीँ हम सोते हैं ac कूलर और गर्म कालीनों के दुकानों में
पर वो कहाँ फंसते  हैं हमारी तरह ये नहीं है वो नहीं है के बहानों  में
फिर भी टांग दिए गए हैं आज  समतल से उठा पहाड़ों की ढलानों में
लटक रही है आज भी घंटी ठहरे पानी के बीच आधे डूबे मंदिर में
गुजर जाते हैं लोग बगल से यही सोचते  की अन्दर बैठा है जो जब उन ढलानों की तरफ
देखता होगा तो  क्या सोचता होगा ---------????


Tuesday, April 2, 2013

1.From the collection of my 'DREAM BOOK'----
हर छोर हमारे रिश्ते का 
बुनता है हर दिन एक नया रेशा 
बुनता है की कैसे 
दो से हम चार होंगे 
पेड़ में लदे आम से 
मसाले दार अचार होंगे.
जायेंगे किसी वर्जिन आइलैंड पर 
पैरों से पैरों को सटा फान्सेंगें मछलियाँ 
ले आऊंगा मैं उन्हें हमारी ही रेशों में बांधकर
टांग दूंगा दो पत्थर जोड़ सुखी लकड़ियों वाली आंच पर
जब तक पकेंगी
रेत पर लेट आसमान की तरफ देखते हुए
निर्धारित करेंगे तारों के बीच हमारी जगह
वहीँ कहीं सप्तर्षि के ध्रुव तारे के पास
हाँ! मैं अकेले वहां नहीं चलूँगा
कुछ सफ़ेद रेशे मेरी बालों के और कुछ तुम्हारे
बनायेंगे एक लम्बी सी सीढ़ी ऊपर साथ जाने की
पर अभी नहीं ---अरे देखो !
कहीं आंच में मछलियों के साथ पक न जायें हमारे रेशे
हर छोर हमारे रिश्ते का
बुनता है हर दिन एक नया रेशा
बुनता है की कैसे?------

Sunday, March 24, 2013

INTROSPECTION SERIES---1.
मेरे घर के पीछे से ट्रेन हर रोज सीटी बजाती जाती है .रेलवे की भाषा में ये संकेत देती है की स्टेशन नज़दीक है .ठीक उसी तरह कोई भी घटना घटने से पहले संकेत जरुर देती है. चिड़ियों की चहचहाहट सुबह होने का संकेत ,पेड़ों से पत्ते झड़ने से पतझड़ आने का संकेत ,घूप्प सी शांति छाने से आने वाले तूफ़ान या आंधी का संकेत अनायास ही मिल जाता है .पर इन संकेतों को भांपने की क्षमता स्वाभाव में होती है .
हमारे समाज में आये दिन यूँ ही बदलाव के संकेत मिलते रहते हैं.कुछ लोग इन सांकेतिक तरंगों सवार हो आगे बढ़ जाते हैं तो वहीँ कुछ लोग बदलाव आने पर देखेंगे या अपनी जड़ता का पोषण करते ही समय काट देते हैं.इतिहास साक्षी रहा है की कई शासन बदले ,सत्ताएं कमजोर हुईं,मजबूत हुईं ,हम गुलाम भी हुए ,फिर वर्षों बाद आज़ाद हुए ...पर क्या समाज के आधारभूत ढांचे के बंधनों से आज़ाद हो पाए ? शायद नहीं! हम आज भी अपनी दकियानूसी रिवाजों की बेड़ियों में जकड़े हुए हैं. समाज से बहिष्कृत होने का डर और इमोशनल एंगल का हमारे जीवन में जरूरत से ज्यादा जगह मिलना ----मेरी समझ से इस जड़ता का कारण है
मानव स्वाभाव बड़ा विचित्र है. वो खुद की अस्मिता को तब तक ठेस नहीं पहुँचने देता जब तक उसके होने पर खतरा उत्पन्न न होने लगे .घरों में न जाने कितने ही नुक्कड़ नाटक खेल लेता है पर बड़े रंगपंच(देश हित के कार्य) पर परफॉरमेंस प्रेशर से ग्रसित रहता है .मैं कहना चाहता हूँ की जब पाकिस्तान के साथ क्रिकेट में हम जाति ,धर्म ,माइनॉरिटी ,मेजोरिटी को दरकिनार कर देते हैं तो भ्रटाचार ,पित्रिसतात्मकता और ऐसे कई मुद्दों के विरोध में क्यूँ पीछे हट जाते हैं ?संविधान ने तो हमें समानता और समान अवसर का अधिकार दिया है फिर भी क्यूँ हम घरों में अपने बेटियों को इन्ही अधिकारों से वंचित रखते हैं?
हमारी मनस्थिति इन पंक्तियों से बिलकुल स्पष्ट होती हैं---
कि--- मन में ही जब द्वंद्व युद्ध चले तो
बदलाव युद्ध भला कौन करे?
परिवार और स्वयं के अस्तित्व पर जब ग्रहण लगे हों
तो सीता और द्रौपदी की रक्षा भला कौन करे?
मंथन करने और निर्णय लेने का समय आ चुका है -------बदलाव संसार का नियम है -----

Monday, March 18, 2013

1.From the collection of my 'STORIES RETOLD' 
बस हाल ही की तो बात है!
मैं तुम था और तुम मेरी मैं थी 
मैं शहर था तुम उसकी शोर थी
मैं सावन था तुम मोर थी
मैं बदली घनघोर था तुम बिजली की कोर थी
मैं जाड़े का आलस था तो तुम रजाई की रुई थी
मैं घर का आँगन था तुम वहां पसरी धुप थी
मैं एक भटकाव था तुम ठहराव थी
जीवन रूपी पूस की रात की अलाव थी
बस हाल ही की तो बात है!
पर अब सारे पात्र और चरित्र विद्रोह कर रहे हैं
क्यूंकि भटकाव के बहाव में मैं कहीं ठहरना भूल गया
और आज बहुत आगे मुन्हाने पे आकर एक बड़ा सा डेल्टा बन गया हूँ
.कहने को अत्यंत उपजाऊ पर किसी भी काम का नहीं
बस हाल ही की तो बात है!---------