2. From the collection of my 'STORIES RETOLD'
बात कुछ दिनों पहले की है
मानसून के बाढ़ कई देखे पर
वहां देखा बिन मानसून वाला बाढ़
दूर एक बांध से पानी छोड़ दिया गया
जैसे लाल कपडे को आगे रख सांड को छोड़ दिया जाता है
कितनों को उलट ता कितनों को चीरता शांत होता है मरने के बाद
उस बांध के सांड ने भी वही किया
घर बार ,गाय बैल, कपडे लत्ते सब
मिनटों में अधजली लाशों की तरह फूलने लगे
उगते डूबते कुछ शक्लें दिखी जिन्हें उठाने हेलीकाप्टर भी भेजे गए थे
डूबना उन्हें मंज़ूर था पर गृह त्याग और विस्थापित होना नहीं
वहीँ पर तो उन्होंने जीना शुरू किया उनके बच्चों ने भी चढ़ना शुरू किया
उन जंगली पेड़ो की टहनियां जब उस उम्र में कुछ बच्चे ककहरे की सीढिया चढ़ते हैं
वो जागते हैं रातों में अलाव जला के ऊपर मचानों में
वहीँ हम सोते हैं ac कूलर और गर्म कालीनों के दुकानों में
पर वो कहाँ फंसते हैं हमारी तरह ये नहीं है वो नहीं है के बहानों में
फिर भी टांग दिए गए हैं आज समतल से उठा पहाड़ों की ढलानों में
लटक रही है आज भी घंटी ठहरे पानी के बीच आधे डूबे मंदिर में
गुजर जाते हैं लोग बगल से यही सोचते की अन्दर बैठा है जो जब उन ढलानों की तरफ
देखता होगा तो क्या सोचता होगा ---------????
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