Saturday, April 6, 2013

3.From the collection of my 'STORIES RETOLD'

दो पंखों वाली वो गोल मुंह वाली तितली याद है ?
आंखें बिलकुल माथे पर लगी बिंदी की तरह होती थी 
३६० डिग्री में पूरा सर घूम जाता था उसका 
वैसा ही मेरा मन भी घूमता रहता था उड़ता रहता था 
सर पे पंख लगाये आँखों में टेलिस्कोप लगाये 
मैं बचपन में उस तितली के पीछे रस्सी बाँध कर साथ में दौड़ा करता था 
वो पतंग थी और मैं उसका लटाई होता था 
याद है मुझे उस समय मैं और बस लाल परी ही होती थी
दोपहर शाम बस यही धमाचौकरी होती थी पर
आज शामें ज्यादातर खाली होती है --- दोपहर भर चाकरी होती है
सर के पंख धुप में सुख गए हैं ---- टेलिस्कोप के लेंस भी पुराने घिसे से हो गए हैं
मन आज भी उड़ता है पर कम ऊंचाई पर
डर लगता है इसको की कहीं थोड़ी सी ढील मिलने पर
२५ साल से लपेटे हुए धागे दुबारा न खुलने लगे ----------

-------------------------------अनंत-------------------------------------

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