Friday, November 16, 2012

shayari series--1.
सुनने सुनाने को नहीं रही हमारी बंदिशें 
कि लोग अब ग़ज़लों के दीवाने नहीं रहे  
छोड़ भी दे तू साकी यूँ पिलाना 
कि पीने पिलाने के अब बहाने नहीं रहे 
घरों में छुप के बैठ गए हैं जिगरवाले  
कि सड़कों पर उतरने के ज़माने नहीं रहे------- 

Wednesday, November 14, 2012

INTROSPECTION SERIES-0.
हर दुसरे दिन मैं इसी सोच में पड़ जाता हूँ कि तुम्हारे नहीं होने पर कहीं हमारे बीच का सब कुछ 'HUM ' से 'MAIN' तो नहीं बन जायेगा .सुबह तुम जब मेरे कंधे पर अपने गर्म साँस की भाप देती हो तो आँखों से आलस चली जाती है .तुम जब मेरे बालों में उंगलियां फेरती हो तो मेरी हर उलझन उसी घुमाव के साथ सुलझने लगती है . जब तुम्हारी आँखों में खुद को देखता हूँ तो आईने को देखने की इच्छा ख़त्म हो जाती है .ऐसा क्यूँ होता है कि मेरे सारे विरोधाभास ,और fantasies  तुमपे आके थम से जाते हैं मंजिल मान संतुष्ट हो जाते हैं? जब तुम होती हो तो होने जैसा लगता है ,जब  नहीं होती तो कुछ भी पाने जैसा नहीं लगता है ---- हर दुसरे दिन -----

Monday, November 12, 2012

प्रारंभ है उत्थान का 
मुक्ति के प्रयाण का
जीर्ण शीर्ण पर्णहीन 
नीड चीर शूरवीर 
दानवीर और फ़कीर 
क्षितिज से व्योम तक
अब बिगुल है उड़ान का
प्रारंभ है उत्थान का .....
TITANIC -- on the verge of sinking-----
एक फ़र्ज़ को ज़िन्दगी की रोशनाई समझ बैठे हैं 
उसके अनकहे अहसासों को रिसते दर्द का दवाई समझ बैठे हैं
क्या कहें हम क्यूँ ऐसे वहम कर बैठे हैं ?
वो हैं जो कहीं दूर सितमगर बन बैठे हैं---------------
The very harsh truth of life-------
आज भर दम
निहारते रहे हम कुछ सूखे पत्तों के सिंकुरन को 
लगा की कभी हम भी यूँ सिमट कर रह जायेंगे 
ऊपर टहनियों के मचानों को छोड़ निचे उतर आएंगे 
छोड़ आएंगे अपने घोंसलों की चहचहाहट को अनसुना कर 
हाँ ! हम उतर आएंगे एक दिन निचे देखने की कैसे 
उम्र के ढलान पर सूखे पत्तों की तरह सब 
एक दिन साफ़ कर दिए जाते हैं 
आता है सुबह कोई झारूवाला और बंद कर सबको 
एक कूड़ेदान में छोड़ आता है सड़क किनारे-------
Every boat has a love story ------
कश्तियों को ये खबर होती है कि 
किस लहर पे उसे सवार होना है 
किसपे टकरा के चितर बितर हो जाना है 
और ये 
बिलकुल उसी तरह है कि जैसे मेरे नजदीकियों से 
तुम्हारी साँसों का धडकनों से भी तेज़ हो जाना 
और मेरी आगे बढ़ने की आहट भर से तुम्हारा 
सिमट कर मुझमे समर्पित हो जाना --------
Retriving 'THE LAGAAN'-----
दिन हो गए कई इस कुएं के मुंडेर पर बैठे 
कोई नहीं आया न कोई बटोही न कोई प्यासा 
सामने घर की चौखट दिखती सुनी 
चौक पर धुप में खड़ा खाट ताश के पत्तों को पूछता 
किसने ऐसी चाल चली जो गाँव के बादशाह गुलाम बन गए 
पत्ते के बंडल का जोकर तुरत बोल पड़ता कोई मेरे जैसा आया है 
सर पर टोपी हाथ में चाबुक सूट बूट और गोरी चमड़ी 
उसने ही फूट डलवाया है सरहद उस पार से आया है 
खेत खलिहान सब साफ़
 कर गए ,जहाजों से समुन्दर पार कर गए
आँगन का ढेंकी किस्मत कूट ता ,
नील के खेतों में हर शख्स आरी पर अब गेहूं बोता
ऐसे ही दिन वो लाया है सरहद पार से आया है
दिन हो गए कई इस कुएं की मुंडेर पर बैठे ------