Monday, November 12, 2012

The very harsh truth of life-------
आज भर दम
निहारते रहे हम कुछ सूखे पत्तों के सिंकुरन को 
लगा की कभी हम भी यूँ सिमट कर रह जायेंगे 
ऊपर टहनियों के मचानों को छोड़ निचे उतर आएंगे 
छोड़ आएंगे अपने घोंसलों की चहचहाहट को अनसुना कर 
हाँ ! हम उतर आएंगे एक दिन निचे देखने की कैसे 
उम्र के ढलान पर सूखे पत्तों की तरह सब 
एक दिन साफ़ कर दिए जाते हैं 
आता है सुबह कोई झारूवाला और बंद कर सबको 
एक कूड़ेदान में छोड़ आता है सड़क किनारे-------

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