INTROSPECTION SERIES-0.
हर दुसरे दिन मैं इसी सोच में पड़ जाता हूँ कि तुम्हारे नहीं होने पर कहीं हमारे बीच का सब कुछ 'HUM ' से 'MAIN' तो नहीं बन जायेगा .सुबह तुम जब मेरे कंधे पर अपने गर्म साँस की भाप देती हो तो आँखों से आलस चली जाती है .तुम जब मेरे बालों में उंगलियां फेरती हो तो मेरी हर उलझन उसी घुमाव के साथ सुलझने लगती है . जब तुम्हारी आँखों में खुद को देखता हूँ तो आईने को देखने की इच्छा ख़त्म हो जाती है .ऐसा क्यूँ होता है कि मेरे सारे विरोधाभास ,और fantasies तुमपे आके थम से जाते हैं मंजिल मान संतुष्ट हो जाते हैं? जब तुम होती हो तो होने जैसा लगता है ,जब नहीं होती तो कुछ भी पाने जैसा नहीं लगता है ---- हर दुसरे दिन -----
हर दुसरे दिन मैं इसी सोच में पड़ जाता हूँ कि तुम्हारे नहीं होने पर कहीं हमारे बीच का सब कुछ 'HUM ' से 'MAIN' तो नहीं बन जायेगा .सुबह तुम जब मेरे कंधे पर अपने गर्म साँस की भाप देती हो तो आँखों से आलस चली जाती है .तुम जब मेरे बालों में उंगलियां फेरती हो तो मेरी हर उलझन उसी घुमाव के साथ सुलझने लगती है . जब तुम्हारी आँखों में खुद को देखता हूँ तो आईने को देखने की इच्छा ख़त्म हो जाती है .ऐसा क्यूँ होता है कि मेरे सारे विरोधाभास ,और fantasies तुमपे आके थम से जाते हैं मंजिल मान संतुष्ट हो जाते हैं? जब तुम होती हो तो होने जैसा लगता है ,जब नहीं होती तो कुछ भी पाने जैसा नहीं लगता है ---- हर दुसरे दिन -----
No comments:
Post a Comment