INTROSPECTION SERIES---1.
मेरे घर के पीछे से ट्रेन हर रोज सीटी बजाती जाती है .रेलवे की भाषा में ये संकेत देती है की स्टेशन नज़दीक है .ठीक उसी तरह कोई भी घटना घटने से पहले संकेत जरुर देती है. चिड़ियों की चहचहाहट सुबह होने का संकेत ,पेड़ों से पत्ते झड़ने से पतझड़ आने का संकेत ,घूप्प सी शांति छाने से आने वाले तूफ़ान या आंधी का संकेत अनायास ही मिल जाता है .पर इन संकेतों को भांपने की क्षमता स्वाभाव में होती है .
हमारे समाज में आये दिन यूँ ही बदलाव के संकेत मिलते रहते हैं.कुछ लोग इन सांकेतिक तरंगों सवार हो आगे बढ़ जाते हैं तो वहीँ कुछ लोग बदलाव आने पर देखेंगे या अपनी जड़ता का पोषण करते ही समय काट देते हैं.इतिहास साक्षी रहा है की कई शासन बदले ,सत्ताएं कमजोर हुईं,मजबूत हुईं ,हम गुलाम भी हुए ,फिर वर्षों बाद आज़ाद हुए ...पर क्या समाज के आधारभूत ढांचे के बंधनों से आज़ाद हो पाए ? शायद नहीं! हम आज भी अपनी दकियानूसी रिवाजों की बेड़ियों में जकड़े हुए हैं. समाज से बहिष्कृत होने का डर और इमोशनल एंगल का हमारे जीवन में जरूरत से ज्यादा जगह मिलना ----मेरी समझ से इस जड़ता का कारण है
मानव स्वाभाव बड़ा विचित्र है. वो खुद की अस्मिता को तब तक ठेस नहीं पहुँचने देता जब तक उसके होने पर खतरा उत्पन्न न होने लगे .घरों में न जाने कितने ही नुक्कड़ नाटक खेल लेता है पर बड़े रंगपंच(देश हित के कार्य) पर परफॉरमेंस प्रेशर से ग्रसित रहता है .मैं कहना चाहता हूँ की जब पाकिस्तान के साथ क्रिकेट में हम जाति ,धर्म ,माइनॉरिटी ,मेजोरिटी को दरकिनार कर देते हैं तो भ्रटाचार ,पित्रिसतात्मकता और ऐसे कई मुद्दों के विरोध में क्यूँ पीछे हट जाते हैं ?संविधान ने तो हमें समानता और समान अवसर का अधिकार दिया है फिर भी क्यूँ हम घरों में अपने बेटियों को इन्ही अधिकारों से वंचित रखते हैं?
हमारी मनस्थिति इन पंक्तियों से बिलकुल स्पष्ट होती हैं---
कि--- मन में ही जब द्वंद्व युद्ध चले तो
बदलाव युद्ध भला कौन करे?
परिवार और स्वयं के अस्तित्व पर जब ग्रहण लगे हों
तो सीता और द्रौपदी की रक्षा भला कौन करे?
मंथन करने और निर्णय लेने का समय आ चुका है -------बदलाव संसार का नियम है -----
मेरे घर के पीछे से ट्रेन हर रोज सीटी बजाती जाती है .रेलवे की भाषा में ये संकेत देती है की स्टेशन नज़दीक है .ठीक उसी तरह कोई भी घटना घटने से पहले संकेत जरुर देती है. चिड़ियों की चहचहाहट सुबह होने का संकेत ,पेड़ों से पत्ते झड़ने से पतझड़ आने का संकेत ,घूप्प सी शांति छाने से आने वाले तूफ़ान या आंधी का संकेत अनायास ही मिल जाता है .पर इन संकेतों को भांपने की क्षमता स्वाभाव में होती है .
हमारे समाज में आये दिन यूँ ही बदलाव के संकेत मिलते रहते हैं.कुछ लोग इन सांकेतिक तरंगों सवार हो आगे बढ़ जाते हैं तो वहीँ कुछ लोग बदलाव आने पर देखेंगे या अपनी जड़ता का पोषण करते ही समय काट देते हैं.इतिहास साक्षी रहा है की कई शासन बदले ,सत्ताएं कमजोर हुईं,मजबूत हुईं ,हम गुलाम भी हुए ,फिर वर्षों बाद आज़ाद हुए ...पर क्या समाज के आधारभूत ढांचे के बंधनों से आज़ाद हो पाए ? शायद नहीं! हम आज भी अपनी दकियानूसी रिवाजों की बेड़ियों में जकड़े हुए हैं. समाज से बहिष्कृत होने का डर और इमोशनल एंगल का हमारे जीवन में जरूरत से ज्यादा जगह मिलना ----मेरी समझ से इस जड़ता का कारण है
मानव स्वाभाव बड़ा विचित्र है. वो खुद की अस्मिता को तब तक ठेस नहीं पहुँचने देता जब तक उसके होने पर खतरा उत्पन्न न होने लगे .घरों में न जाने कितने ही नुक्कड़ नाटक खेल लेता है पर बड़े रंगपंच(देश हित के कार्य) पर परफॉरमेंस प्रेशर से ग्रसित रहता है .मैं कहना चाहता हूँ की जब पाकिस्तान के साथ क्रिकेट में हम जाति ,धर्म ,माइनॉरिटी ,मेजोरिटी को दरकिनार कर देते हैं तो भ्रटाचार ,पित्रिसतात्मकता और ऐसे कई मुद्दों के विरोध में क्यूँ पीछे हट जाते हैं ?संविधान ने तो हमें समानता और समान अवसर का अधिकार दिया है फिर भी क्यूँ हम घरों में अपने बेटियों को इन्ही अधिकारों से वंचित रखते हैं?
हमारी मनस्थिति इन पंक्तियों से बिलकुल स्पष्ट होती हैं---
कि--- मन में ही जब द्वंद्व युद्ध चले तो
बदलाव युद्ध भला कौन करे?
परिवार और स्वयं के अस्तित्व पर जब ग्रहण लगे हों
तो सीता और द्रौपदी की रक्षा भला कौन करे?
मंथन करने और निर्णय लेने का समय आ चुका है -------बदलाव संसार का नियम है -----
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