दो मातंगी चले गजंडी
उठा के झंडी पहन के बंड़ी
पहुंचे सन्डे हो गए ठन्डे
बिन पानी और सिग्नल के बन रहे हैं चंगे
क्या कहें गजंडी
रहती जहाँ हर की तंगी
ब्लाक की मंदी तो कभी लाइट की भंगी
प्रकृति को छोड़ और कोई नहीं होता संगी
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