Sunday, September 2, 2012

  वो भी  दिन  क्या दिन थे

पिछले महीने  कुछ यादें चार बरस  पुरानी हो गयी
जब  घंटों बैठ  गंगा को निहारा करते थे
नाविक को नदी में उतारती सुबह को देख रात की खुमारी उतरती थी
बैठ के  उन टीलों  पर कुछ प्रेम पंची  राग ठुमरी दादरा गाया करते थे
देखा करते थे हम कभी
अलकतरे  वाली छतों पर बैठ कर पीछे  ऊँघता  एक windmill
शायद कभी तो  से हवा से   यारी निभा बिजली  पैदा किया किया  करती  होगी
याद है हमें लोगों के सर के  ऊपर से गुजरता वो पुलिया जहाँ घंटों बैठ  किसी खिड़की की जाफरी की फरफराहट को दिल की धड़कन बनाया  करते थे
शायद उन  गुलमोहर के  पत्तों के बीच अपने चीथ्रे दिखाता  वो तिरस्कृत  concrete का बेंच
दुबारा हमें देख खुश हो जाये
जाने कितनी ही ग्लास (चाय के )उसने गोपाल से  उधार मंगवाई होंगी
याद हैं वो दिन जब
चवन्नी अठन्नी जमा   कर एक एक  कश का जुगाड़  होता था
पिछले महीने  कुछ यादें चार बरस  पुरानी हो गयी--------

No comments:

Post a Comment