While going through images of Madhubani Paintings in the morning ,suddenly i came across one of the paintings i saw someone drawing during a marriage ceremony when i once visited my village in my childhood.Consequently,my heart plunged into a very proud at the same time helpless feeling for this beautiful art form .I am going तो give my first hands onto it in near future but the following line
s could not wait that long .--------
सच कहूँ तो लगता है ख्वाहिशें रोशनी सी होती है
बहुत अन्दर दफ़न होने पर भी फर्श खोद उभर आती है
बुझते दिए की आखिरी पुरजोर ल़ौ की तरह
भभक उठती है बिफर पड़ती है अपने माज़ी पे
कुछ ऐसा कभी कबार हो जाता है कि मैं
लिखना छोड़ खींचना शुरू कर देता हूँ
आरी तीरची रेखाएं कुछ घर के दीवारों की नक्काशियां
बस देखा ही था बचपन में एक बार किसी की शादी में
पर अब वो मुझे देख आशा भरे मन से ताकती हैं
मानो पूछ रही हो की मुझे कब उभारोगे कब रंगोगे
इस विशाल भारत ह्रदय पर कब लोग मुझे भी देख उमड़ पड़ेंगे
मैं फिर उलझ जाता हूँ उन आरी तीरची रेखाओं की ज्यामिति में
अपने लोगों को उकेरने में उस बड़े नक़्शे पर उन्हें बिखेरने में ------
सच कहूँ तो लगता है ख्वाहिशें रोशनी सी होती है
बहुत अन्दर दफ़न होने पर भी फर्श खोद उभर आती है
बुझते दिए की आखिरी पुरजोर ल़ौ की तरह
भभक उठती है बिफर पड़ती है अपने माज़ी पे
कुछ ऐसा कभी कबार हो जाता है कि मैं
लिखना छोड़ खींचना शुरू कर देता हूँ
आरी तीरची रेखाएं कुछ घर के दीवारों की नक्काशियां
बस देखा ही था बचपन में एक बार किसी की शादी में
पर अब वो मुझे देख आशा भरे मन से ताकती हैं
मानो पूछ रही हो की मुझे कब उभारोगे कब रंगोगे
इस विशाल भारत ह्रदय पर कब लोग मुझे भी देख उमड़ पड़ेंगे
मैं फिर उलझ जाता हूँ उन आरी तीरची रेखाओं की ज्यामिति में
अपने लोगों को उकेरने में उस बड़े नक़्शे पर उन्हें बिखेरने में ------
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