Sunday, October 28, 2012

एक वक़्त आता  है हरेक की जिंदगी में जब वो सपने रोपता है दिल की खेत में ,रात दिन धीरज धर ख़ुशी की क्यारियाँ बनता है और इंतज़ार की पटवन देता रहता है .वो हर वक़्त ये निश्चित करता है की हर क्यारी से भविष्य जी कोपलें फूटेंगी पर प्प्रकृति केवल निडर और सक्षम पौध को ही पनपने देती है ---- डार्विन की सर्वाइवल फॉर the फिट्टेस्ट  थ्योरी बिलकुल फिट बैठती है यहाँ .
                                          आप सोच रहे होंगे मैं क्या सपनों से भरे घर में खेती बारी की हल चलाने लगा पर ज़रा सोंचा जाये तो लगेगा की जीतने और उभरने की प्प्रवृति सबमें एक सामान नहीं होती .अब मकान के किसी कोने में उग आये छोटे पीपल को ही देख लीजिये .उसे किसी पानी ,मिटटी और संरक्षण की जरूरत नहीं होती .उसे बस उभरना आता है ,पुरजोर तरीके से ,बुलंदियों पर पहुंचना आता है .शायद यही तो कारन है की पेड़ों में वो सबसे पूजनीय है .मानवीय इक्षा शक्ति भी इसी जुझारूपन का उदहारण है ,जब कमजोर पर  जाती है तो फिसल जाती है कुछ ऊंचाई तय करके .वैसे भी ऊंचाई सबके लिए सुगम और स्थाई नहीं होती ,बारिशों में सीढियों पर काई जम जाने से फिसलन अक्सर बढ़ जाया करती है ,बहुत कम लोग ही चढ़ पाते हैं .कुछ उदहारण हमारे आस पास के समाज में भी है , अब गरीबी को ही ले लीजिये . अगर भारत के सन्दर्भ में कहा जाये तो गरीबी केवल बढ़ना जानती है ,उसे क्या चाहिए बढ़ने के लिए --- कमजोर इक्षा शक्ति ,जनसँख्या विस्फोट ,कमज़ोर प्रजातंत्र या किसी की फूटी किस्मत? पर सब का मूल इक्षाशक्ति में ही निहित है .इसी की तनों से जनसँख्या विष्फोट के पत्ते निकलते हैं .भूख लालच ,आलसीपण के मूत्र विसर्जन से ये हर दिन सींचे जाते हैं ,एक बार पनपने  के बाद सारी सीरतों को खोखला कर देते  हैं .
                                           ऐसे ही धतूरे के खेतों में इस कहानी का पात्र सृजित किसी कुमुदनी की फूल की तरह खिलता है ,बड़ी मुसीबतों में जन्म लेता है -------आगे लिखने का टाइम नहीं मिल प् रहा है ----पर लिखूंगा ------अनंत 

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