Tuesday, October 2, 2012


पिछले महीने कुछ यादें चार बरस पुरानी हो गयी
जब घंटों बैठ गंगा को निहारा करते थे
नाविक को नदी में उतारती सुबह को देख रात की खुमारी उतरती थी
बैठ के उन टीलों पर कुछ प्रेम पंची ठुमरी दादरा गाया कर...
ते थे

देखा करते थे हम कभी
अलकतरे वाली छतों पर बैठ कर पीछे ऊँघता एक windmill
शायद कभी तो से हवा से यारी निभा बिजली पैदा किया किया करती होगी

याद है हमें लोगों के सर के ऊपर से गुजरता वो पुलिया जहाँ घंटों बैठ
किसी खिड़की की जाफरी की फरफराहट को दिल की धड़कन बनाया करते थे

शायद उन गुलमोहर के पत्तों के बीच अपने चीथ्रे दिखाता वो तिरस्कृत concrete का बेंच
दुबारा हमें देख खुश हो जाये
जाने कितनी ही ग्लास (चाय के )उसने गोपाल से उधार मंगवाई होंगी
याद हैं वो दिन जब
चवन्नी अठन्नी जमा कर एक एक कश का जुगाड़ होता था
पिछले महीने कुछ यादें चार बरस पुरानी हो गयी--------

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