आगे आने वाले कुछ वाक्य किसी कहानी की तरफ इशारा नहीं करते ,ये महज़ कुछ बात चीत ,मान मनौवल के वाकयें हैं जो मेरे और मेरे कमरे में रहने वालों के बीच अक्सर होते हैं -----
पिछले ४ महीने से हर शाम दिन भर की थकन लिए मैं जब घर लौटता हूँ तो बिस्तर से लगा एक कोना बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करता दीखता है , मैं बता दूँ आपको की ये कोना मुझे बेहद अज़ीज़ है क्यूंकि यहीं से सारी कवितायें और कहानियाँ जन्म लेती हैं और यहीं दफ़न भी हो जाती हैं .यहाँ तीन कुर्सियां हैं लकड़ी के हंडल वाली ,ऊपर शेल्फ पर थोडा गंगाजल और एक ताम्बे का लोटा रखा है , कुछ तसवीरें भी लटकी हैं मेरे बचपन वाली .शाम को जब चाय पर इनके पास बैठता हूँ तो सब बारी बारी से मुझे कमरे में दिन भर घटी घटनाओं के बारे में बताते हैं .रोशन दान बतातें हैं की कैसे दोपहर का सूरज घंटों मेरे बिस्तर पर लेता रहता है .कुर्सियों के हंडल पर चिपकी धुल कहती है की दिन भर कैसे लड़ झगड़ कर अज पछुआ हवा ने कमरे के अन्दर घुस कर तबाही फैलाई है . वैसे कमरे में दायें तरफ के खिड़की का पल्ला अज कल नाराज़ रहता है मुझसे ,हर दिन तो मैं वहीँ खड़े होकर बालों में कंघी किया करता हूँ पर उसके टूटे टांग को देखकर भी अनसुना कर मुंह फेर चला जाता हूँ ,सायद इसीलिए अब उसने हवा के सामने विरोध प्रदर्शन करना भी बंद कर दिया है .ताम्बे के लोटे के गर्दन की चमक फीकी पद गयी है ,पपात नहीं क्यूँ मैंने कई दिनों से उसे नहीं छुआ है ,हर रोज पहले वो बहार दहेरी पर रखे तुलसी से मिलने जाता था ,उस प्रेम मिलन में भी मेरी व्यस्तता ने रोक दिया है .फर्श हर रोज जूतों से कहता रहता है की तुम्हे तो हर दिन कोई नाकोई पुचकारता है ,नहलाता है पर मुझे व्वो मुन्ह्झौसी नौकरानी अब देखने भी नहीं आती ,जाने कितने कितने महीनों से मेरे देह पर परत दर परत धुल जमती जा रही है .
आज बड़े फुर्सत में उठा .सबकी समस्याएं सुनी ,लोटे और तुलसी का जी भर मिलन हुआ ,कुछ किताबों जिनकी दोस्ती दीमक से हो चुकी थी मैंने उन्हें kattiकरवा के उनसे दूर lawn में घास पर अच्छे से सुला दिया ,मिस्त्री को बुला उस नकचढ़ये खिड़की के नाक में भी दो नकेल क़स दी .फर्श पर नंगे पों बैठा रहा ,मनाता रहा रूठे फर्श को ,जब उसका जी न भरा तो उसने मुझे गर्म पानी से नहलाने के लिए कहा . शायद सर्दियों के कारण अब नौकरानी भी उसे नहीं देखती होगी .जब दोपहर में तस्वीरों के पास गया तो उन्होंने मुझे देख अपने नाक मुंह सिकोड़ लिए.बेचारे सबसे कोने वाली तस्वीर के कमर में टेढ़ी टंगे होने की वजह से मोंच आगई थी.मैंने उसे उतर उसक्के कमर सीढ़ी की ,थोडा एंटी तेर्मिते तेल से मालिश भी की.
शाम होने को है ,सूरज भी दूसरी शिफ्ट लगाने की जल्दी में है पर सब खुश हैं और मैं भी खुश हूँ , और सप्ताह बाद लिख रहा हूँ. पर शायद इस बात चीत के गहरे मायने समझाने की गुस्ताखी करना चाहता हूँ .कहना चाहता हूँ की आखिर इस आप धापी में हम क्यूँ इन छोटे छोटे निर्जीवों को भूल जाते हैं जो शायद हमारे साथ सबसे ज्यादा समय बीताते हैं? क्यूँ ये अकसर अनछुए ,बेईजत्ति भरी नज़रों से हमें देखते रहते हैं और हम मुंह फेर लिया करते हैं? पपर चलो अज मैं खुश हूँ की कमसकम कभी कभी तो इनकी फ़रियाद सुन ली जाती है -----
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