Tuesday, October 2, 2012

I thought hundred times before posting it but couldnt stop myself.This is really not written to offend anyone individualy.So kindly read without any prejudice and personal inclination if u lay ur eyes on it --------
चंद अरसों में कहाँ से कहाँ आ गए हम?
पहले चारा खाया करते थे अब कोयला भी खाने लगे हैं हम 
मनुष्यता तो पूर्वजों से विरासत में मिली थी हमें न!
फिर गुसल्खोर से आदमखोर कब बन गए हम?
सन ४७ में कुछ पौधे lagaye थे
घने जड़ों वाले हरे पत्तों वाले
पर शायद दीमक भी वहीँ मिटटी में दबा आये थे हम
वर्षों बीत गए ,कई बारिशों के बावजूद भी
नहीं फूलते अब ,खोखले हो चुके तने नहीं झूलते अब
चंद अरसों में -----
un दीवारों पर अभी भी कुछ तसवीरें टँगी रहती है जिनके नीचे बैठ
हम खुद को बेचा करते हैं
पर टंगी रहे उनका क्या हमारे लोग तो आने वाली हर नस्लों में खून के बदले बेईमानी की दवा चढ़ाया करते हैं

हम कहते हैं की घर का सिपए- सलार मौन है पर
इस कदर घर के इज्ज़त की नीलामी का ज़िम्मेदार आखिर कौन है ?
कौन है जो जात -पात ,स्वार्थ -कृतार्थ के सहारे जीता है?
घडी घडी टेबल कुर्सियों पर नोट के नोट पटकता फिरता है ?
खैर हमें तो आदत पड़ चुकी है बैसाखियों और खूटों की
कोल्हू के बैल जो ठहरे ,निकालते रहेंगे तेल हम देश का
पर शायद वक़्त अब अक्सर कहा करता है
की अब ऐसी भी क्या मजबूरी है ?
घुट घुट कर रो-धो कर मरना यूँ क्या ज़रूरी है ?

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