Wednesday, September 16, 2015

मैं चलूँगा ,अभी और चलूँगा!
देखना है मुझे कि क्षितिज के पार क्या है ?
मेरा मुक्कम्मल जहाँ क्या है ?
मैं चलूँगा देखने कि कैसे
वक़्त के तराजू पे उम्र का पलड़ा झुकने लगता है
कुछ दूर जूतों में चलकर खाली पैर  बैठने लगता है
चेहरे की झुर्रियां बढ़ने लगती हैं
एक बच्चा उसमें कई कहानियां गढ़ने लगता है
               मैं चलूँगा …अभी  और चलूँगा
कि देखना है मुझे उत्तरी गोलार्ध का सतरंगी आसमान
जिसे औरोरा बोरियलिस कहते हैं
छूना है कुछ बर्फ के मचान
जिसे इग्लू कहते हैं
वहीँ से बनवा लाऊंगा  सील के छाल से बने दो जोड़े मोज़े
एक अपने लिए और एक तुम्हारे लिए
फिर घूमने चलेंगे सर्दियों में एलिफिस्टन पार्क।
                मैं चलूँगा। …अभी और चलूँगा। ....

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