आखिर कब तक
पिछले कई दिनों से शहर के तेवर बदले से लग रहे हैं
दरवाजे के बाहर हर वक़्त कोई
कुण्डी लगा बैठा जान पड़ता है
अब घर की चौखटें ऊँची कर लोग
मांदों में रहने लगे हैं
मेलों में, ट्रेनों में
बाजारों में और गलियों में
सर पर कफ़न बांध चलने लगे हैं
जात पात ,छुआ छूतकी दीवारें
बहुत पीछे ढह गयीं मालूम पड़ती है
अब तो जिहाद,नक्सालवाद और छेत्रवाद
के धमाके जगह जगह गूंजने लगे हैं
अख़बारों की सुर्खियाँ लहुलूहान सी रहती हैं
जिंदगी भी यारों अब तो बेईमान सी लगती है
पर कब तक --------
शिकवा शिकायत यूहीं होते रहेंगे
फटी- चिथडी लाशों पर हम रोते रहेंगे
कुण्डी तोड़ो ,दरवाजे खोलो
सिंह सी दहाड़ो,देश की बागडोर संभालो
उन्हें क्या लगता है हम
अपनों को अब यूहीं खोते रहेंगे?
बाँट नहीं सकता कोई अब हिन्दू को मुस्लमान से
आरती को अजान से ,धमाको का क्या है
वो तो होते ही रहेंगे
आरती को अजान से ,धमाको का क्या है
वो तो होते ही रहेंगे
जाओ जाकर कह दो उनसे क़ि
हम न बदले थे न अब बदलेंगे
ईद बकरीद , dushera और होली
यहाँ होते रहे थे और आगे भी होते रहेंगे
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