Wednesday, April 25, 2012

                           आखिर कब तक 


पिछले कई दिनों से शहर के तेवर बदले से लग रहे  हैं
दरवाजे के बाहर हर वक़्त कोई
कुण्डी लगा  बैठा जान  पड़ता है
                      अब घर की चौखटें ऊँची कर लोग 
                      मांदों में रहने लगे हैं 
                      मेलों में,       ट्रेनों में
                      बाजारों में और गलियों में
                      सर पर कफ़न बांध चलने लगे हैं 

जात पात ,छुआ छूतकी दीवारें
बहुत पीछे ढह गयीं मालूम पड़ती है 
अब तो जिहाद,नक्सालवाद और छेत्रवाद 
के धमाके जगह जगह गूंजने लगे हैं

                     अख़बारों की सुर्खियाँ लहुलूहान सी रहती हैं
                     जिंदगी भी यारों अब तो बेईमान सी लगती है 

पर कब तक --------
शिकवा शिकायत यूहीं होते रहेंगे
फटी- चिथडी लाशों पर हम रोते रहेंगे
कुण्डी तोड़ो ,दरवाजे खोलो
सिंह सी दहाड़ो,देश की बागडोर संभालो
उन्हें क्या लगता है हम
अपनों को अब यूहीं खोते रहेंगे?

                    बाँट नहीं सकता कोई अब हिन्दू को  मुस्लमान से
                    आरती को अजान से  ,धमाको का क्या है
                    वो तो होते ही रहेंगे

जाओ जाकर कह दो उनसे क़ि 
हम न बदले थे न अब बदलेंगे 
ईद बकरीद , dushera और  होली 
यहाँ होते रहे थे और आगे भी होते  रहेंगे 

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